जैनों में अक्षय तृतीया का महत्व | Importance of akshay tritiya in jainism




अक्षय तृतीया पर्व जैन धर्मावलम्बियों का महान धार्मिक पर्व है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान ने एक वर्ष की पूर्णतपस्या करने के पश्चात इक्षु (शोरडी-गन्ने) रस सेपारायण किया था।

 जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर श्री आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवंअपने कर्म बंधनों को तोड़ने के लिए संसार के  भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर जैन वैराग्य अंगीकार कर लिया। सत्य और अहिंसा के प्रचार करते-करतेआदिनाथ प्रभु हस्तिनापुर गजपुर पधारे जहाँ इनके पौत्र सोमयश का शासन था। प्रभु का आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर दर्शनार्थ उमड़ पड़ा सोमप्रभु के पुत्र राजकुमार श्रेयांस कुमार ने प्रभु को देखकर उसने आदिनाथ को पहचान लिया और तत्काल शुद्ध आहार के रूप में प्रभु को गन्ने का रस दिया, जिससे आदिनाथ ने व्रत का पारायण किया। जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि गन्ने के रस को इक्षुरस भी कहते हैं इस कारण यह दिन इक्षु तृतीया एवं अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात हो गया। 



भगवान श्री आदिनाथ ने लगभग ४०० दिवस की तपस्या के पश्चात पारायण किया था। यहलंबी तपस्या एक वर्ष से अधिक समय की थी अत: जैन धर्म में इसे वर्षीतप से संबोधित किया जाता है। आज भी जैन धर्मावलंबी वर्षीतप की आराधना करअपनेको धन्य समझते हैं, यह तपस्या प्रति वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरम्भ होती है और दूसरे वर्ष वैशाख के शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया के दिन पारायण कर पूर्ण की जाती है। तपस्या आरंभ करने से पूर्व इस बातका पूर्ण ध्यान रखा जाता है कि प्रति मास की चौदस को उपवास करना आवश्यक होताहै। इस प्रकार का वर्षीतप करीबन १३ मास और दस दिन का हो जाता है। 

उपवास में केवल गर्म पानी का सेवन किया जाता है। वर्षीतप जब पूर्ण हो जाता है तब भारत विख्यात जैन तीर्थ श्री शत्रुंजय पर जाकर अक्षय तृतीय के दिन पारायण किया जाता है। इस दिन विशाल स्तर पर पारायण की व्यवस्था की जाती है। जहाँपर तपस्या करनेवाले तपस्वियों को उनके संबंधी पारायण कराते हैं। अक्सर तपस्वी बहन को भाई
पारायण कराता है। इसे पारणा कहते हैं।

चांदी के बने छोटे सेआकार के कलश इक्षु के रस के १०८ भरे कलशों से पारायण आरम्भ होता है। धार्मिक गतिविधियों
से ओत-प्रोत इस भव्य समारोह में संवेदनाएँ स्वत: ही उमड़ पड़ती हैं। चारों ओर धर्म चर्चा का वातावरण बन जाता है।
पुष्पों की बौछारहोती है। रंग-बिरंगे परिधान एवं आभूषण तपस्वी को उनके सगे-संबंधी भेंट करते हैं, फूलों के हार पहनाकर
तपस्वियों का आदर सत्कार होता है। चारों ओर हर्ष, उमंग का वातावरण बन जाता है। तपस्वियों का विशेष जलूस
समारोहपूर्वक निकाला जाता है और सभी तपस्वियों को तपस्या करने वाले परिवार के सदस्य कुछ न कुछ उपहार भेंट
करते हैं। इसे प्रभावना कहते हैं।

 उपहार में चांदी, स्टील, पीतल आदि के बर्तनों के अतिरिक्त धार्मिक सामग्री भी भेंट दी
जाती है। इस प्रकार की तपस्या में हज़ारों नर-नारी भाग लेते हैं। जिसमें वृद्ध, युवा एवं बाल अवस्था के लोग भी सम्मिलित होते हैं। श्री शत्रुंज्य जैसे महान तीर्थ पर अक्षय तृतीय के दिन विशाल पैमाने पर मेला लगता है जिसमें देश के
विभिन्न भागों से हज़ारों लोग आते हैं। कई तपस्वी ऐसे होते हैं जो इस तीर्थ पर वर्ष भर रहकर वर्षीतप की आराधना करते
हैं। यहाँ तपस्या करने वाले श्री शत्रुंज्य पर्वत की ९९ बारयात्रा करने का लाभ भी उठाते हैं।
भारत वर्ष में इस प्रकार की वर्षी तपश्चर्या करने वालों की संख्या हज़ारों तक पहुँच जाती है। यह तपस्या धार्मिक दृष्टिकोणसे अन्यक्त ही महत्वपूर्ण है, वहीं आरोग्य जीवन बिताने के लिए भी उपयोगी है।

संयम जीवनयापन करने के लिए इस प्रकार की धार्मिक क्रिया करने से मन को शान्त, विचारों में शुद्धता, धार्मिक प्रवृत्रियों में रुचि और कर्मों को काटने में सहयोगमिलता है। इसी कारण इस अक्षय तृतीया का जैन धर्म में विशेष धार्मिक महत्व समझा जाता है। मन, वचन एवं श्रद्धा से वर्षीतप करने वाले को महान समझा जाता है।


अभी ज्वाइन करे - https://hinditechz.com/

Source (Copied From) : Light  of  Universe  - Jainism.

जैनों में अक्षय तृतीया का महत्व | Importance of akshay tritiya in jainism जैनों में अक्षय तृतीया का महत्व | Importance of akshay tritiya in jainism Reviewed by Vardhman Jain on April 22, 2019 Rating: 5

No comments:

Powered by Blogger.